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Thursday, June 13, 2013

Kantkari, Solanum surrattence/Solanum xanthocarpus, कंटकारी

आयुर्वेद की यह अनोखी औषधी लगभग सारे उत्तर भारत मे हर जगह और् हर मोसम मे मिल जाती है । लगभग सभी निघुंटुओं मे इसका वर्णन मिलता है । आधुनिक द्र्व्य गुण मे इसको कासघ्न वर्ग मे रखा गया है । 
भावप्रकाश मे इसका वर्णन इस प्रकार से आया है ---
कंटकारीसरातिक्ताकटुका दीपनी लघु: ।
रुक्षोष्णापाचनीकासश्वासज्वरकफ़ानिलान् ॥
निहन्तिपीनसंपार्शवपीडाकृमिह्रुदमयान् ।
तस्या: फ़लंकटुरसेपाके च कटुकंभवेत् ॥
शुक्रस्यरेचनंभेदितिक्तंपित्ताग्निकृल्लघु ।
हन्यात् कफ़मरुककंडुकासमेद:कृमिज्वारन् ॥
तद्व्त्प्रोक्ता सिता क्षुद्रा विशेषाद् गर्भकारिणी ।
कंटकारी तिक्त और् कटु रस युक्त दीपन कर्म करने वाली रुक्ष, पाचन करने वाली श्वास, ज्वर, कफ़ वात का हरण करने वाली होती है । 
पूराना नजला, पार्श्वपीड़ा ( निमोनिया) , कृमि, हृदयरोगेहितकर होती है ।
इसके फ़ल कटुरसयुक्त और् शुक्र रेचन होते है यानि की वाजीकरण होते है ।  विशेषकर सफ़ेद फ़ुलो वाली कंटकारी गर्भप्रद होतीहै ।
मै अपनी आयुर्वेदशाला मे इसको निम्नलिखित रोगों मे उपयोग करता हू -
  • बच्चों के गुदाकृमि मे इसके सूखे फ़लो मे सरसो का तैल मिलाकर अग्निपर रखकर धुआं करने से गुदा गत कृमि मर कर बाहर निकल आते है ं ।
  • मैच्युरेशन अरेस्ट के कारण हुई शुक्रणता मे प्रयोग किया जाता है 
  • विभिन्न त्वचारोगों मे अन्य द्र्व्यों के साथ इससे सिद्ध् घृत का प्रयोग किया जाता है ।
  • कैंसररोग खासकर उर्ध्वजत्रुगत कैंसर यानि की गले का कैंसर मे इसका प्रयोग अन्य द्र्व्यों जैसे कि पर्पटक, गोमुत्र, गिलोय, चिरयता आदि से बनाया गया अर्क बहुत ही चम्तकारी असर डालता है ।
  • जीर्णकास मे इसका अवलेह बहुत ही उपयोगी होता है इसके लिये व्याघ्री हरितकी, कंटकारी अवलेह आदि का प्रयोग करता हुं ।
  • अपानवायु जन्य स्त्री रोग के बन्ध्य्त्व मे उपयोग किया जाता है ।
  • जीर्णपीनस रोगों मे इसका अवलेह और इससे सिद्ध् तैल बहुत ही उपयोगी है 
  • हाई ब्लडप्रैशर मे उपयोग किया जाताहै ।
स्रोतोवरोध को दूर करने वाली यह महाऔषधि रोगघ्नता मे चमत्कार  करती है पर यह वैद्य की युक्ति की आपेक्षा करती है ।
उष्णवीर्य होने पर यह कफ़वातशामक होते हुए भी विभिना पित्तविकारों मे भरपूर प्रयोग की जाती है ।
अधिक जानकारी के लिये संपर्क करें --- Dr. D.P Rana

Saturday, January 1, 2011

Vitex negundo, Five-leaved Chaste,निर्गुण्डी, सम्हालू


वातहर द्रव्यों मे यह विशेष स्थान रखती है। इसका बहुवर्षायु कठिन  क्षुप होता है । इसके पत्र त्रिपत्रक या पंच पत्रक , दन्तुर भालाकार होते हैं ।  पुष्प मंजरियों मे आते है और नीलाभ रंग के होते हैं ।
यह लगभग हर जगह मिल जाती है।
आचार्यों ने इसको विषघ्न, क्रिमिघ्न, और सुरसादि गण मे रखा है , आधुनिक द्र्व्यगुण मे इसको वेदना स्थापन 
गण मे रखा है ।
आयुर्वेदिक गुण कर्म --
                लघु, रुक्ष, विपाक मे कटु, रस मे कटु तिक्त, वीर्य मे उष्ण , कफ़वात शामक 
मै अपनी आयुर्वेदशाला मे इसको निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हुँ --
  • शिरोविरेचन के लिये इसके स्वरस का प्रयोग विशेष कर पीनस रोग मे 
  • बीजों का प्रयोग  कफ़ के अवरोध को दूर करने के लिये विशेष कर फ़ेलोपियन ट्युब की रुकावट के लिये
  • विभिन्न दुष्ट व्रणों के रोपण के लिये इससे सिद्ध तैल बहुत ही कारगर है 
  • वातरोगों यथा आमवात संधिवात रोग मे इसके क्वाथ से स्थानिक वाष्प स्वेदन और आभ्यांतर प्रयोग 
प्रयोज्यांग-- पत्र , मूल, स्वरस । मात्रा  मूलत्वक चुर्ण- ३ ग्रा, बीज चुर्ण - ३ ग्रा . 
चित्र प्राप्ति स्थान -- करनाल ( हरियाणा ) 
 आप सभी को नव वर्ष की शुभकामनाएँ 


Saturday, August 14, 2010

eclipta alba, भृंगराज

यह एक छोटा क्षुप होता है जो कि उत्तर भारत मे लगभग हर जगह मिल जाता है , यह प्राय: नमी वाली जगह पर मिलता है ।


पत्ते लंबे और नोकिले होते हैं व अभिअमुख होते हैं । तने का रंग लालिमा लिये हुए होता है , पूराने पौधे के पत्ते भी लालिमा लिये हुए हरे रंग के होते हैं ।
पुष्प छोटे वृण्त युक्त और सफ़ेद रंग के होते है । तथा छोटे छोटे बीजो युक्त होते हैं बिल्कुल सुरज मुखी के फ़ुलों की तरह लगते हैं ।
यह कटु रस युक्त तीक्ष्ण , रुक्ष, उष्ण होता है ,
प्रभाव -- केशों को रंजने वाला , यानि इसका प्रयोग मुख्य रूप से बालों की बिमारियों मे किया जाता है ।
कफ़वात शामक, उत्तम रसायन, लिवर टोनिक, केश्य, कृमिनाशक, श्वासकास नाशक, नेत्ररोग नाशक, शिरोरोग नाशक ।
मै इसको अपनी आयुर्वेदशाला मे निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हूँ --
  • उदररोगॊं मे इसके स्वरस का प्रयोग ।
  • अर्श या बवासीर मे इसके स्वरस का प्रयोग और इसके पांचाग की मसी का प्रयोग रक्तजार्श मे स्थानिक प्रयोग
  • विभिन्न रसायन कर्मो के लिये भृंगराजासव का प्रयोग
  • बालो की सम्स्याऒ मे इससे सिद्द तैल का प्रयोग
  • विभिन्न त्वचारोगों मे स्थानिक और अभ्यांतर प्रयोग
  • मुत्ररोगो मे जब मुत्र की मात्रा कम हो और मुत्र गाड़ा और लाल रंग का हो
चित्र प्राप्ति स्थान --- राणा एग्रिकल्चर फ़ार्म जिला करनाल हरियाणा ।
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Sunday, April 11, 2010

Abutilon indicum , country mallow, अतिबला , कंघी


उत्तर भारत मे हर ऋतु मे मिल जाता है , पत्ते लट्वाकार दन्तुर छोटे व बडे़ हो सकते है , फ़ुल पीले रंग के होते है , बसंत मे फ़ूल आते है , फ़ल कंघी के आकार के गोल गोल होते है , बीज काले या कुछ भुरे रंग के होते हैं ।

गुण कर्म--

गुण- लघु, स्निग्ध, पिच्छिल,

रस-- मधुर

विपाक -- मधुर

वीर्य -- शीत

ओजोवर्धक, त्रिदोषशामक, रक्तज अर्श, शुक्रवर्धक, शुक्रशोधन, Rasayana, बाँझपन,
इसके सभी गुण लगभग बला के समान होते है ।

  • इसके पत्तों को गुड़ मे रख कर खाली पेट देने पर रक्तार्श मे लाभ होता है ।

Tuesday, April 6, 2010

Sida cordifolia,Country Mallow, बला, खिरैंटी


इसका बहुवर्षायु क्षु्प हो्ता है , इसकी कई प्रजातियाँ होती है । पत्ते लट्वाकार और दन्तुर होते है , पु्ष्प--पत्रकोणो से उत्त्पन पीले रंग के होते है ।बीज छोटे भूरे या काले रंग के होते है । इसके बीजों को बीजबन्द के नाम से जाना जाता है।


चित्र प्राप्ति स्थान -- करनाल (हरियाणा)


आयुर्वेदिक गुण---


गुण-- लघु,स्निग्ध,पिच्छिल


रस-- मधुर


विपाक-- मधुर


वीर्य-- शीत


बल्य, गर्भप्रद, वातशामक, शो्थनाशक, हृदयरोगनाशक, शुक्रवर्धक,ओजोवर्धक ।


मै अपनी आयुर्वेदशाला मे इसको निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हूँ-


  • क्षयरोग व आजो वर्धन के लिये

  • स्त्रियों के बाँझपन के लिये

  • पुरुषों मे शुक्रहीनता के लिये

प्रयोज्यांग-- स्वरस व मूल चुर्ण

बलारिष्ट मे यह मुख्य घटक के रुप मे होती है ।




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