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Sunday, February 23, 2025

✨ S. Astha Moringa Cap – Advanced Joint Pain Relief ✨🌿

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🍃 What Makes S. Astha Moringa Cap So Effective? 🍃


Our unique formula is powered by three powerful herbs:


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Nature’s Anti-Inflammatory Agent


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Saturday, January 1, 2011

Vitex negundo, Five-leaved Chaste,निर्गुण्डी, सम्हालू


वातहर द्रव्यों मे यह विशेष स्थान रखती है। इसका बहुवर्षायु कठिन  क्षुप होता है । इसके पत्र त्रिपत्रक या पंच पत्रक , दन्तुर भालाकार होते हैं ।  पुष्प मंजरियों मे आते है और नीलाभ रंग के होते हैं ।
यह लगभग हर जगह मिल जाती है।
आचार्यों ने इसको विषघ्न, क्रिमिघ्न, और सुरसादि गण मे रखा है , आधुनिक द्र्व्यगुण मे इसको वेदना स्थापन 
गण मे रखा है ।
आयुर्वेदिक गुण कर्म --
                लघु, रुक्ष, विपाक मे कटु, रस मे कटु तिक्त, वीर्य मे उष्ण , कफ़वात शामक 
मै अपनी आयुर्वेदशाला मे इसको निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हुँ --
  • शिरोविरेचन के लिये इसके स्वरस का प्रयोग विशेष कर पीनस रोग मे 
  • बीजों का प्रयोग  कफ़ के अवरोध को दूर करने के लिये विशेष कर फ़ेलोपियन ट्युब की रुकावट के लिये
  • विभिन्न दुष्ट व्रणों के रोपण के लिये इससे सिद्ध तैल बहुत ही कारगर है 
  • वातरोगों यथा आमवात संधिवात रोग मे इसके क्वाथ से स्थानिक वाष्प स्वेदन और आभ्यांतर प्रयोग 
प्रयोज्यांग-- पत्र , मूल, स्वरस । मात्रा  मूलत्वक चुर्ण- ३ ग्रा, बीज चुर्ण - ३ ग्रा . 
चित्र प्राप्ति स्थान -- करनाल ( हरियाणा ) 
 आप सभी को नव वर्ष की शुभकामनाएँ 


Monday, December 6, 2010

Vernonia cineria , Purple fleabane,सहदेवी

इसका कोमल क्षूप तुलसी के पौधे की तरह का होता पत्ते भी लगभग तुलसी के तरह के होते हैं ।उत्तर भारत मे लगभग हर जगह यह सितम्बर के बाद हर जगह दिखाई देता है। इसके कुछ गुलाबी या बैगंनी रंग के फ़ुल आते हैं ।

आयुर्वेदिक गुण--
यह लघु, रुक्ष, रस मे तिक्त विपाक मे कटु और वीर्य मे उष्ण होता है।

प्रभाव से यह स्मोहित करने वाला और ज्वर नाशक होता है।

ज्वरं हन्ति शिरोबद्धा सहदेवी जटा यथा ॥

कफ़वातशामक, ज्वरहर, शोथहर, वेदनास्थापन कृमिघ्न आदि वर्गों मे इसको रखा गया है ।
मुख्य रुप से इसका प्रयोग विषम ज्वर मे होता है , इसमे इसका स्वरस १० से २० मि. लि. थोड़ा गरम करके देते हैं ।
तिक्त और लघु होने से यह चर्म विकारो और प्रमेह मे भी उपयोगी है ।
चित्र प्राप्ति स्थान -- राणा एग्री. फ़ार्म जिला करनाल

Monday, November 29, 2010

बिल्व, बेल, Aegle marmelos


लघु,रुक्ष,कषाय, तिक्त विपाक मे कटु और वीर्य मे उष्ण होने के कारण यह कफ़ वात शामक है । आधुनिक द्र्व्यगुण मे इसको ग्राही वर्ग मे रखा गया है।
उत्तरभारत मे हर जगह मिल जाता है । इसका बहुवर्षायु वृक्ष होता है , पत्र त्रिपत्रक होते है , फ़ल गोल कठोर और बड़े आकार का होता है ।
अधिक जानकारी के लिये कृपया चित्र देंखे ।

विल्व का फ़ल अपक्व ही श्रेष्ठ होता है , पका हुआ फ़ल वातकारक और अग्निमंद करने वाला होता है ।
बिल्व का मूल, त्वचा, पत्र तथा फ़ल का गुदा औषधार्थ व्यवहृत होता है ।
दशमूलादि कषायों मे मूल या त्वचा का प्रयोग करना चहिए । इसका मूल मादक तथा ग्यान तंतुओ पर शामक असर करने वाला माना जाता है। अत: यह निद्रानाश आदि मे प्रशस्त है ।
कच्चा बिल्व्फ़ल मज्जा और सोंफ़ तथा वचा के साथ आंव मे विशेष लाभ करता है।
ग्रहणी और आंव की यह विशेष औषधि है ।

Monday, August 23, 2010

Crataeva nurvala, वरूण, बरणा

यह बहुवर्षायु वृक्ष होता है जो लगभग हर जगह मिल जाता है , उत्तर भारत मे इसका वृक्षखेतो मे कही कही मिल जाता है , इसके सफ़ेद फ़ूल आते है और पत्र त्रिपत्रक होते है बेल की तरह ।

जनवरी से अप्रैल तक यह वृक्ष निश्पत्र रहता है । इसके फ़ल निम्बु के आकर के होते हैं।
यह अत्यधिक उष्ण होता है और प्रभाव से अश्मरी भेदन का काम करता है । इसके अतिरिक्त इसका प्रयोग अंतरविदर्धि और ग्रंथि मे भी किया जाता है ।
यह लघु रुक्ष, तिक्त कषाय कटु होने के कारण शरीर मे स्रोतशोधन का काम करता है ।
मै इसको अपनी आयुर्वेदशाला मे अश्मरी भेदन और शोथ के लिये करता हँ ।
वातरक्त, गण्डमाला, बस्तिशुल, मुत्रमार्ग संक्रमण अश्मरी, की यह विशिष्टऔषधि है ।

चित्रप्राप्ति स्थान == राणा एग्रिकल्चर फ़ार्म जिला करनाल हरियाणा
प्रयोज्यांग -- त्वक

Sunday, August 22, 2010

Capparis decidua, करीर, कैर, करीं


यह प्राय शुष्क प्रदेश मे पाया जाता है , हरियाणा, राजस्थान आदि मे सूखी जगह पर पाया जाता है। यह पत्रविहीन एवं कंटीला क्षुप होता है और झाड़ीनुमा होता है।
ज्यादा डीटेल आप फ़ोटो से प्राप्त कर सकते हैं ।
यह कफ़वात शामक होता है और मुख्य रुप से जन्तुघ्न, व्रणशोधन, वेदनास्थापन और शुष्कार्शनाशक होता है ।

इसकी कोमल कोपलो को यदि मसल कर शरीर के किसी हिस्से पर लगा दे तो वहां पर विदाह उत्त्पन्न कर करके फ़फ़ोले पैदा कर देता है ।
मुख्य रुप से इसका प्रयोग सुखी बबासीर मे किया जाता है , इसका आचार वातशामक और वातानुलोमक होता है ।
कोमल कोंपलो को मसल कर कल्क बांधने से गृध्रसी रोग मे लाभकरी है।
कफ़वात शामक , लघु रुक्ष, कटु तिक्त और उष्ण होने के कारण यह फ़फ़ज और वात्ज हृदय रोग मे भी लाभकरी है ।
चित्र प्राप्ति स्थान -- जिला करनाल हरियाणा

Saturday, August 14, 2010

eclipta alba, भृंगराज

यह एक छोटा क्षुप होता है जो कि उत्तर भारत मे लगभग हर जगह मिल जाता है , यह प्राय: नमी वाली जगह पर मिलता है ।


पत्ते लंबे और नोकिले होते हैं व अभिअमुख होते हैं । तने का रंग लालिमा लिये हुए होता है , पूराने पौधे के पत्ते भी लालिमा लिये हुए हरे रंग के होते हैं ।
पुष्प छोटे वृण्त युक्त और सफ़ेद रंग के होते है । तथा छोटे छोटे बीजो युक्त होते हैं बिल्कुल सुरज मुखी के फ़ुलों की तरह लगते हैं ।
यह कटु रस युक्त तीक्ष्ण , रुक्ष, उष्ण होता है ,
प्रभाव -- केशों को रंजने वाला , यानि इसका प्रयोग मुख्य रूप से बालों की बिमारियों मे किया जाता है ।
कफ़वात शामक, उत्तम रसायन, लिवर टोनिक, केश्य, कृमिनाशक, श्वासकास नाशक, नेत्ररोग नाशक, शिरोरोग नाशक ।
मै इसको अपनी आयुर्वेदशाला मे निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हूँ --
  • उदररोगॊं मे इसके स्वरस का प्रयोग ।
  • अर्श या बवासीर मे इसके स्वरस का प्रयोग और इसके पांचाग की मसी का प्रयोग रक्तजार्श मे स्थानिक प्रयोग
  • विभिन्न रसायन कर्मो के लिये भृंगराजासव का प्रयोग
  • बालो की सम्स्याऒ मे इससे सिद्द तैल का प्रयोग
  • विभिन्न त्वचारोगों मे स्थानिक और अभ्यांतर प्रयोग
  • मुत्ररोगो मे जब मुत्र की मात्रा कम हो और मुत्र गाड़ा और लाल रंग का हो
चित्र प्राप्ति स्थान --- राणा एग्रिकल्चर फ़ार्म जिला करनाल हरियाणा ।
Posted by Picasa

Wednesday, July 21, 2010

,Clerodendrum phlomidis अग्निमंथ, अरणी


इसका बहुवर्षायु क्षुप होता है जो कि झुण्ड बनाकर बड़ता है , पत्र लट्वाकार और अभिमुख होते है पुष्प सफ़ेद होते है ।
इसको वृहद अग्निमंथ के आभाव मे प्रयोग किया जाता है ।

यह लगभग सारे उत्तर भारत मे पाया जाता है ।
इसके गुण और प्रयोग-
उष्ण, दीपन, सारक, बल्य, रसायन, शोथहर होता है ।

कफ़ वात शामक , बल्य, रसायन, शोथहर

मै इसकॊ निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हुँ--
आगन्तुज शोथ मे इसके क्वाथ से अवगाहन स्वेद करने से तुरंत लाभ मिलता है ।
हृदय रोग (कफ़ज) मे इसके क्वाथ और शिलाजीत का सेवन बहुत ही उपयोगी है ।
आमवात और आंत्रिक ज्वर मे इसका प्रयोग विषतिन्दुक वटी के साथ करने से फ़ायदा मिलता है ।
मधुमेह मे इसके पत्रस्वरस का प्रयोग किया जाता है।
विभिन्न विस्फ़ोट युक्त ज्वरों की अवस्था मे इसके क्वाथ या स्वरस का प्रयोग किया जाता है।


चित्र प्राप्ति स्थान-- राणा एग्रीक्ल्चर फ़ार्म , जिला करनाल हरियाणा ।

Saturday, June 26, 2010

Ricinus communis, एरण्ड, पंचाँगुल,


एरण्ड लगभग सारे भारतवर्ष मे हर जगह मिल जाता है , जैसा की नाम से विदित होताहै इसके पते एक फ़ैले हुए हाथ की तरह होते है , इसलिये इसको पंचाँगुल कहते है । वातहर एवं वृष्य द्रव्यों मे यह सर्वश्रेष्ठ है ऎसा चरक ने बताया है , आजकल वैद्यवर्ग इसका चिकित्सा मे भरपूर उपयोग करते है । वात रोगों मे यह मेरी प्रिय औषधि है , इसका विभिन्न रुपॊं मे प्रयोग किया जा सकता है , जैसे कि , एरण्ड मूल का क्वाथ या चुर्ण, इसके बीजों का तैल , इसके बीजों द्वारा बनाया गया एरण्ड पाक जो की मुख्य रुप से बड़ती हुई उम्र मे शरीर मे हो रही वात वृद्दि का शमन करता है और बड़ती हुई उम्र मे होने वाले रोग जैसे की , अनिद्रा, शरीर मे बाय - बादी, चिन्तन करना, चलने फ़िरने मे परेशानी आदि आदि ।
हमारे ग्रन्थ एरण्ड के बारे मे क्या कहते हैं--

गुण कर्म-- स्निग्ध, तीक्ष्ण, सूक्ष्म .
रस-- मधुर,
विपाक- मधुर
वीर्य-- उष्ण
कफ़वातशामक, वातहर, वाजीकरण, हृदयरोगनाशक, आमवातशामक, वेदनास्थापन, उदररोग नाशक, बस्तिशूल नाशक, योनिरोगनाशक, शुक्ररोगनाशक, वृदिरोग नाशक, स्त्नयरोगनाशक, स्रोतोशोधन, वय:स्थापन, शोथनाशक, कटिशूल नाशक ।
मै अपनी आयुर्वेदशाला मे इसकॊ निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हूँ --
  • कमरदर्द मे दशमूल क्वाथ और एरण्ड तैल के साथ , साथ मे शिलजीत मिलाकर बहुत ही लाभदायक
  • विभिन्न योनिरोगों मे , विशेषकर कृच्छार्तव, मासिक अनियमितता, ओवेरियन पोलिसिस्टिक रोग, आदि रोगों मे
  • शुक्र रोगों मे खासकर शुक्राणुओं की कमी , लो मोटिलीटि, आदि मे मुलेठी चुर्ण के साथ लगातार प्रयोग करने से लाभ मिलता है ।
  • सन्धि शूल और आमवात मे एरण्ड तैल और एरण्ड्मूल + रास्ना क्वाथ ।
  • वृद्धावस्थाजन्य रोग मे एरण्ड पाक बलारिष्ट के साथ बहुत ही उपयोगी ।
  • गृध्रसि रोग मे सुरांजन , विषतिन्दुक, रससिन्दुर और एरण्ड तैल का अभ्यान्तर प्रयोग और साथ मे एरण्ड तैल मे गर्म किये हुए एरण्ड के पत्तों से सेक लाभदायक ।
  • आमवात रोग मे बहुत ही उपयोगी , इसके तैल मे भ्रष्ट हरितकी और सिंहनाद गुगलु बहुत ही उपयोगी ।
स्तनोंमे उत्पन्न गांठों मे एरण्डतैल लगाकर एरण्ड पत्र बांधने से लाभ मिलता है ।

मार्किट मे इसके निम्नलिखित योग आसनी से मिल सकते हैं---

एरण्ड पाक, एरण्डमूलादि क्वाथ, रास्नासप्तक क्वाथ, एरण्ड तैल, सिंहनाद गुग्गुलु आदि ।

Wednesday, May 26, 2010

Barleria prionitis, सहचर, सैरेयक, पियाबाँसा


यह एक बहुवर्षायु कंटकित क्षुप होता है जो कि उष्ण स्थानो पर प्रायश: शुष्क भुमि पर मिलता है । पत्ते बिल्कुल बासे के तरह के होते है , पुष्प पीले रंग के मंजरियो मे आते है , इसके काण्ड पर काँटे होते है ।
आधुनिक द्रव्यगुण मे इसको कुष्ठ्घ्न कहा गया है । इसके द्वारा सिद्ध सहचरादि तैल वैद्यों मे बहुत प्रसिद्ध है जो कि वात नाशक होता है ।
आयुर्वेदिक गुण कर्म-
लघु, स्निग्ध, तिक्त मधुर ,, कटु, वीर्य - उष्ण

कफ़वातशामक, वेदनास्थापन, व्रणरोपण, व्रण शोधन, केश्य, विषनाशक. प्रदररोगनाशक.

प्रयोग---

विभिन्न वात रोगों मे इससे सिद्ध तैल का प्रयोग बस्ति और अभ्यंग मे किया जाता है ।
प्रदर रोग मे इसका रस देसी खाण्ड मे मिलाकर दिया जाता है।
पत्तों के कल्क को विभिन्न त्वक विकारों मे प्रलेप किया जाता है ।

प्रसिद्ध योग-- सहचरादि तैल

चित्र प्राप्ति स्थान-- करनाल, हरियाणा

Friday, May 14, 2010

Nerium indicum, Indian oleander करवीर,, कनेर


उत्तर भारत मे लगभग हर जगह बागों मे लगाया हुआ पाया जाता है । इसका हर भाग विषैला होता है अत: इसे किसी वैद्य की देखरेख मे ही प्रयोग करें ।

आधुनिक द्रव्यगुण मे इस को हृदय वर्ग मे रखा गया है ।

इसकी मुख्य दो प्रजातियां होती है श्वेत और रक्त यहाँ पर रक्त करवीर का वर्णन किया जा रहा है +

लघु, रुक्ष, तीक्ष्ण। कटु, तिक्त। उष्ण । उपविष

त्वचा रोग नाशक, व्रण शोधन, कुष्ठ रोग नाशक, कफ़वात शामक, शोथहर, रक्तशोधक, हृदय रोगनाशक (दुर्बलता जन्य)

  • विभिन्न त्वचा रोगों मे इसके पत्रों से सिद्ध तैल का प्रयोग किया जाता है , इससे सिद्ध तैल व्रण शोधन और व्रण रोपण भी होता है ।
  • हृदय रोगो मे जब कोई और उपाय नही होता है तो इसका प्रयोग किया जाता है , इसके मात्रा १२५ मि. ग्रा से ज्यादा नही होनी चाहिये
श्वास और कास रोग मे करवीर के पत्रों की भस्म को शहद मे मिलाकर देने से लाभ मिलता है

वैद्य की देखरेख मे ले ।

चित्रप्राप्ति स्थान== करनाल हरियाणा

मात्रा-- मूल चुर्ण-- १२५ मि. ग्रा

Wednesday, May 12, 2010

Cassia occidentalis , Negro Coffee, कासमर्द


उत्तर भारत मे लगभग हर जगह मिल जाता है , इसका छोटा क्षुप लगभग ३ से ४ फ़ुट तक बड़ जाता है । पीले रंग के फ़ुल अप्रैल और मई मे आते है ,बीज लम्बी फ़लियों मे आते है ।

कफ़वातशामक, पित्तसारक, कासश्वास हर, कुष्ठहर, वातानुलोमक, रेचन


रुक्ष, लघु, तीक्ष्ण, तिक्त , मधुर कटु, उष्ण

  • कास श्वास मे इसके पत्तों के रस का प्रयोग किया जाता है,
  • पित्त के निर्हरण के लिये इसके पत्तों का शाक खिलाया जाता है ।
  • इसके बीजों के चुर्ण का प्रयोग विभिन्न त्वचा रोगों मे लेप के रुप मे किया जाता है।
  • कण्ठ शोधन के लिये इसकी मूल कॊ मुह मे धारण किया जाता है ।
  • कासमर्द बीज चुर्ण, पत्रस्वरस और गंधक का लेप सिध्म(ptrisys versicolor रोग मे प्रय़ोग किया जाता है

Monday, April 19, 2010

Achyranthes aspera, अपामार्ग, लटजीरा,Prickly chaff flower


उत्तरभारत लगभग हर जगह मिल जाता है । बहुवर्षायु क्षुप, छोटे बीजों (कंटक युक्त) की मंजरी युक्त , इसके बीज यदि कपड़ों से स्पर्श हो जाते है तो चिपक जाते हैं ।


लघु, रुक्ष, तीक्ष्ण,

कटु, तिक्त

कटु विपाक एवं उष्ण वीर्य

उत्तम लीवर टोनिक, शोथहर, वेदना शामक, कृमिहर, शिरोविरेचन, हृदयरोग नाशक, रक्तज अर्श नाशक,

अपामार्ग के बीजो के नस्य लेने से छींके आती है और पुराना नजला और गर्दन के उपर के रोगों मे लाभ मिलता है

बीजों के कल्क को चावल के धावन से लेने पर रक्तज अर्श मे लाभ करता है
पांचांग का क्वाथ लिवर और उदर रोगों मे बहुत ही फ़ायदा करता है

इसका क्षार बेहतर कफ़ निस्सारक है , और विभिन्न कल्पनाओं मे प्रयोग किया जाता है , क्षारसुत्र मे भी इसका प्रयोग किया जाता है ।

कास श्वास मे इसका क्षार प्रयोग किया जाता है ।
धवल कुष्ठ निवारणार्थ इसके क्षार को मैनशिल और गोमुत्र मे पीसकर लेप कियाजाता है ।
इसकी मूल को गुलाब जल या शहद मे पीसकर आंखो मे लगाने से कृष्ण पटल के रोगों मे लाभ मिलता है


Wednesday, April 7, 2010

Lochnera rosea, Madagascar periwinkle संदपु्ष्पा, सदाबहार


आधुनिक द्रव्य औषधि विग्यान मे इस को रक्तार्बुद नाशक गण मे रखा गया है । इसका छोटा क्षुप होता है जो कि लगभग हर घर मे मिलजाता है , इसकी दो तरह की प्रजाति होती है एक गुलाबी रंग के फ़ुलों की और दुसरी सफ़ेद रंग के फ़ुलो की । भारत मे लगभग हर जगह यह बागों मे गमलो मे घरॊ मे लगाया हुआ मिल जाता है ।


आयुर्वेदिक गुण----


गुण---लघु रुक्ष, तीक्ष्ण


रस-- कषाय, कटु


विपाक-- कटु


वीर्य-- उष्ण


रक्तार्बुदनाशक, प्रमेहनाशक, कफ़वात शामक,


चित्र प्राप्ति स्थान-- करनाल (हरियाणा)


मै अपनी आयुर्वेदशाला मे इसको निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हूँ--



  • सफ़ेद फ़ुलों वाली प्रजाति के पत्रो के कल्क का का प्रयोग मधुमेह मे किया जाता है ।

  • रक्तार्बुद मे इसके मूल चुर्ण का प्रयोग किया जाता है

  • रक्तभाराधिकय मे इसके पांचांग के चुर्ण लाभदायक होता है ।

प्रयोज्यांग-- पत्र, मूल, पांचांग


Saturday, April 3, 2010

Solanum surratence,Yellow Berried Night shade ,कंटकारी,छोटी कटेरी


इसका फ़ैलने वाला , बहुवर्षायु क्षुप होता है ,पत्ते लम्बे काँटो से युक्त हरे होते है , पुष्प नीले रंग के होते है , फ़ल क्च्चे हरित वर्ण के और पकने पर पीले रंग के हो जाते है , बीज छोटे और चिकने होते है ।

यह पश्चिमोत्तर भारत मे शुष्कप्राय स्थानों पर होती है ।

आयुर्वेदिक गुण कर्म--
गुण-- लघु, रुक्ष, तीक्ष्ण

रस-- तिक्त, कटु

विपाक-- कटु

वीर्य-- ऊष्ण

कफ़वात शामक, कासहर, शोथहर, रक्तशोधक, बीज शुक्रशोधन, हृदयरोगनाशक, वातशामक,रक्तभारशामक( Lowers the Blood pressure) ।

मै अपनी आयुर्वेदशाल मे इसको निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हूँ --
  • विभिन्न त्वचा रोगों मे पंचतिक्त घृत के रूप मे
  • विस्फ़ोट(Boils) पर इसके बीजों का लेप किया जाता है
  • श्वास व कास रोगों मे , जहाँ कफ़ गाड़ा और पीलापन लिये हुए होता है
कंटकारी के प्रचलित योग -- व्याघ्रीहरितकी, कण्टकारी घृत, व्याघ्री तैल, पंचतिक्तघृत, निदिग्धिकादि क्वाथ ।

Thursday, April 1, 2010

Calotropis procera , Madar, आक, अर्क, आखा


यह बहुवर्षायु गुल्म या क्षुप होता है जो कि शुष्क और सुखी जमीन पर अधिक पाया जाता है , पश्चिमोत्तर भारत मे यह बहुत मिलता है , इसकी मुख्यतया दो प्रजाति होती है , एक लाल फ़ुलो वाला और एक सफ़ेद फ़ुलो वाला , यहाँ पर लाल फ़ूल वाले अर्क का वर्णन किया गया है । बसंत मे गुच्छो मे फ़ूल लगते है जो कि सफ़े या कुछ लाल रंग के होते है और गर्मियों मे फ़ल आने पर रुई के समान इस मे से रेशे निकलते है ।

आयुर्वेदिक गुण--
गुण-- लघु , रुक्ष , तीक्ष्ण
रस-- कटु, तिक्त
विपाक-- कटु
वीर्य-- उष्ण

कफ़वातशामक, शोधनीय, वमनोपग,विरेचन,

मै अपनी आयुर्वेदशाला मे इस का निम्नलिखित रोगोंमे व्यवाहर करता हुँ==

  1. विभिन्न उदररोगों मे अर्क लवण का प्रयोग
  2. कर्ण पीड़ा मे ताजे पीले पतों के स्वरस को कुछ गरम करके , कान मे डालने से तुरंत लाभ होता है
  3. कठिन , रुक्ष , मोटे, पाकरहित , दद्रु रोग, आदि त्वचा रोगों मे जिसमे पाक न होता है , इसके मूल की त्वचा का लेप या इसका दुध लाभदायक होता है
  4. माईग्रेन (Migraine ) की यह विशेष औषधि है
  5. भगन्दर कि चिकित्सा मे प्रयुक्त क्षारसूत्र को इसके दुध से भावित करके बनाया जाता है ।
  6. विष दुर करने के लिये इसकी मूल के चुर्ण का प्रयोग किया जाता है , इससे वमन और विरेचन दोनो एकदम हो जाते है और काया विष रहित हो जाती है
  7. शोशयुक्त जोडो़ के दर्द मे और आमवात इसके पत्तो को गरम करके बांधने से लाभ मिलता है
  8. श्वास रोग मे इसको फ़ुलो को शुण्ठि और वासा मुलचुर्ण के साथ कोष्ण जल से लेने से फ़ायादा होता है ।

Monday, March 29, 2010

Euphorbia thymifolia , नागार्जुनी, दुग्धिका, छोटी दुद्धी


आयुर्वेदिक गुण--
गुण- गुरु, रुक्ष,तीक्ष्ण,
रस- कटु, तिक्त , मधुर

विवरण-- यह छोटा प्रसरणशील, भूमि पर फ़ैलने वाला, रोमश,बिन्दी जैसे पत्ते वाला, रंग हरा व लाली लिये हुए हरा. होता है ।

मुख्य रूप से कफ़वात शामक होता है ।

मै अपनी आयुर्वेदशाला मे इसको निम्नलिखित व्याधियों मे प्रयोग करता हुँ---
  1. रक्तज अर्श( बवासीर ) की वर्धमान अवस्था मे बहुत ही उपयोगी , इसके कल्क को लेने से मांसाकुर सुख कर रक्तज अर्श को समाप्त कर देते हैं ।
  2. स्त्रियों के बन्ध्यत्व मे बहुत ही उपयोगी, इस पोधे मे यह विशेष गुण होता है की यह स्रोतोवरोध जन्य स्थिति मे बहुत ही अच्छा कार्य करती है , ट्युब ब्लोकेज मे यह उपयोगी द्रव्य है ।
  3. मधुमेह मे हल्दी और वासा स्वरस के साथ बहुत ही अच्छा प्रभाव दिखाती है ।

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