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Monday, December 6, 2010

Vernonia cineria , Purple fleabane,सहदेवी

इसका कोमल क्षूप तुलसी के पौधे की तरह का होता पत्ते भी लगभग तुलसी के तरह के होते हैं ।उत्तर भारत मे लगभग हर जगह यह सितम्बर के बाद हर जगह दिखाई देता है। इसके कुछ गुलाबी या बैगंनी रंग के फ़ुल आते हैं ।

आयुर्वेदिक गुण--
यह लघु, रुक्ष, रस मे तिक्त विपाक मे कटु और वीर्य मे उष्ण होता है।

प्रभाव से यह स्मोहित करने वाला और ज्वर नाशक होता है।

ज्वरं हन्ति शिरोबद्धा सहदेवी जटा यथा ॥

कफ़वातशामक, ज्वरहर, शोथहर, वेदनास्थापन कृमिघ्न आदि वर्गों मे इसको रखा गया है ।
मुख्य रुप से इसका प्रयोग विषम ज्वर मे होता है , इसमे इसका स्वरस १० से २० मि. लि. थोड़ा गरम करके देते हैं ।
तिक्त और लघु होने से यह चर्म विकारो और प्रमेह मे भी उपयोगी है ।
चित्र प्राप्ति स्थान -- राणा एग्री. फ़ार्म जिला करनाल

Monday, November 29, 2010

बिल्व, बेल, Aegle marmelos


लघु,रुक्ष,कषाय, तिक्त विपाक मे कटु और वीर्य मे उष्ण होने के कारण यह कफ़ वात शामक है । आधुनिक द्र्व्यगुण मे इसको ग्राही वर्ग मे रखा गया है।
उत्तरभारत मे हर जगह मिल जाता है । इसका बहुवर्षायु वृक्ष होता है , पत्र त्रिपत्रक होते है , फ़ल गोल कठोर और बड़े आकार का होता है ।
अधिक जानकारी के लिये कृपया चित्र देंखे ।

विल्व का फ़ल अपक्व ही श्रेष्ठ होता है , पका हुआ फ़ल वातकारक और अग्निमंद करने वाला होता है ।
बिल्व का मूल, त्वचा, पत्र तथा फ़ल का गुदा औषधार्थ व्यवहृत होता है ।
दशमूलादि कषायों मे मूल या त्वचा का प्रयोग करना चहिए । इसका मूल मादक तथा ग्यान तंतुओ पर शामक असर करने वाला माना जाता है। अत: यह निद्रानाश आदि मे प्रशस्त है ।
कच्चा बिल्व्फ़ल मज्जा और सोंफ़ तथा वचा के साथ आंव मे विशेष लाभ करता है।
ग्रहणी और आंव की यह विशेष औषधि है ।

Thursday, October 21, 2010

Phyllanthus niruri,भूमिआँवला


यह एक छोटा क्षुप होता है जो कि प्राय वर्षाऋतु मे अधिक मिलता है प्राय उत्तर भारत मे लगभग हर मिल जाता है ।
पत्ते हर रंग के डैंचे के पौधे के तरह होते है , यदि हम पत्तों को उलट कर देखते है तो छोटे छोटे आमले की तरह के बीज पत्ते के पीछे लगे रहते है इसीलिये इसे भुमि आमला के नाम से जाना जाता है ।
आधुनिक द्रव्यगुण मे इसको मुत्रल वर्ग मे रखा गया है लेकिन इसका मुख्य प्रयोग लीवर रोगों मे सफ़लता पूर्वक किया जा रहा है ।

यह रुक्ष, लघु, तिक्त, कषाय , मधुर , और वीर्य मे शीत स्वभाव का होता है
यह वातकृत और कफ़पित्तशमन होता है ।
विभिन्न प्रकार के दुष्ट व्रणो मे उपद्रवॊं को रोकने के लिये इसको धारण किया जाता है ।
लीवर के रोगो मे यह बहुत ही उपयोगी होता है ।
यह मुत्रविरेचक भी होता है ।
मैने इसका स्वतंत्र रुप से अपनी आयुर्वेदशाला मे प्रयोग नही किया है ।
चित्रप्राप्ति स्थान-- जिला करनाल हरियाणा
प्रयोज्यांग-- पांचाग, मात्रा-- स्वरस १० से २० मि. लि. चुर्ण- १ से ३ ग्रा. ।

Monday, August 23, 2010

Crataeva nurvala, वरूण, बरणा

यह बहुवर्षायु वृक्ष होता है जो लगभग हर जगह मिल जाता है , उत्तर भारत मे इसका वृक्षखेतो मे कही कही मिल जाता है , इसके सफ़ेद फ़ूल आते है और पत्र त्रिपत्रक होते है बेल की तरह ।

जनवरी से अप्रैल तक यह वृक्ष निश्पत्र रहता है । इसके फ़ल निम्बु के आकर के होते हैं।
यह अत्यधिक उष्ण होता है और प्रभाव से अश्मरी भेदन का काम करता है । इसके अतिरिक्त इसका प्रयोग अंतरविदर्धि और ग्रंथि मे भी किया जाता है ।
यह लघु रुक्ष, तिक्त कषाय कटु होने के कारण शरीर मे स्रोतशोधन का काम करता है ।
मै इसको अपनी आयुर्वेदशाला मे अश्मरी भेदन और शोथ के लिये करता हँ ।
वातरक्त, गण्डमाला, बस्तिशुल, मुत्रमार्ग संक्रमण अश्मरी, की यह विशिष्टऔषधि है ।

चित्रप्राप्ति स्थान == राणा एग्रिकल्चर फ़ार्म जिला करनाल हरियाणा
प्रयोज्यांग -- त्वक

Wednesday, July 21, 2010

,Clerodendrum phlomidis अग्निमंथ, अरणी


इसका बहुवर्षायु क्षुप होता है जो कि झुण्ड बनाकर बड़ता है , पत्र लट्वाकार और अभिमुख होते है पुष्प सफ़ेद होते है ।
इसको वृहद अग्निमंथ के आभाव मे प्रयोग किया जाता है ।

यह लगभग सारे उत्तर भारत मे पाया जाता है ।
इसके गुण और प्रयोग-
उष्ण, दीपन, सारक, बल्य, रसायन, शोथहर होता है ।

कफ़ वात शामक , बल्य, रसायन, शोथहर

मै इसकॊ निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हुँ--
आगन्तुज शोथ मे इसके क्वाथ से अवगाहन स्वेद करने से तुरंत लाभ मिलता है ।
हृदय रोग (कफ़ज) मे इसके क्वाथ और शिलाजीत का सेवन बहुत ही उपयोगी है ।
आमवात और आंत्रिक ज्वर मे इसका प्रयोग विषतिन्दुक वटी के साथ करने से फ़ायदा मिलता है ।
मधुमेह मे इसके पत्रस्वरस का प्रयोग किया जाता है।
विभिन्न विस्फ़ोट युक्त ज्वरों की अवस्था मे इसके क्वाथ या स्वरस का प्रयोग किया जाता है।


चित्र प्राप्ति स्थान-- राणा एग्रीक्ल्चर फ़ार्म , जिला करनाल हरियाणा ।

Saturday, June 26, 2010

Ricinus communis, एरण्ड, पंचाँगुल,


एरण्ड लगभग सारे भारतवर्ष मे हर जगह मिल जाता है , जैसा की नाम से विदित होताहै इसके पते एक फ़ैले हुए हाथ की तरह होते है , इसलिये इसको पंचाँगुल कहते है । वातहर एवं वृष्य द्रव्यों मे यह सर्वश्रेष्ठ है ऎसा चरक ने बताया है , आजकल वैद्यवर्ग इसका चिकित्सा मे भरपूर उपयोग करते है । वात रोगों मे यह मेरी प्रिय औषधि है , इसका विभिन्न रुपॊं मे प्रयोग किया जा सकता है , जैसे कि , एरण्ड मूल का क्वाथ या चुर्ण, इसके बीजों का तैल , इसके बीजों द्वारा बनाया गया एरण्ड पाक जो की मुख्य रुप से बड़ती हुई उम्र मे शरीर मे हो रही वात वृद्दि का शमन करता है और बड़ती हुई उम्र मे होने वाले रोग जैसे की , अनिद्रा, शरीर मे बाय - बादी, चिन्तन करना, चलने फ़िरने मे परेशानी आदि आदि ।
हमारे ग्रन्थ एरण्ड के बारे मे क्या कहते हैं--

गुण कर्म-- स्निग्ध, तीक्ष्ण, सूक्ष्म .
रस-- मधुर,
विपाक- मधुर
वीर्य-- उष्ण
कफ़वातशामक, वातहर, वाजीकरण, हृदयरोगनाशक, आमवातशामक, वेदनास्थापन, उदररोग नाशक, बस्तिशूल नाशक, योनिरोगनाशक, शुक्ररोगनाशक, वृदिरोग नाशक, स्त्नयरोगनाशक, स्रोतोशोधन, वय:स्थापन, शोथनाशक, कटिशूल नाशक ।
मै अपनी आयुर्वेदशाला मे इसकॊ निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हूँ --
  • कमरदर्द मे दशमूल क्वाथ और एरण्ड तैल के साथ , साथ मे शिलजीत मिलाकर बहुत ही लाभदायक
  • विभिन्न योनिरोगों मे , विशेषकर कृच्छार्तव, मासिक अनियमितता, ओवेरियन पोलिसिस्टिक रोग, आदि रोगों मे
  • शुक्र रोगों मे खासकर शुक्राणुओं की कमी , लो मोटिलीटि, आदि मे मुलेठी चुर्ण के साथ लगातार प्रयोग करने से लाभ मिलता है ।
  • सन्धि शूल और आमवात मे एरण्ड तैल और एरण्ड्मूल + रास्ना क्वाथ ।
  • वृद्धावस्थाजन्य रोग मे एरण्ड पाक बलारिष्ट के साथ बहुत ही उपयोगी ।
  • गृध्रसि रोग मे सुरांजन , विषतिन्दुक, रससिन्दुर और एरण्ड तैल का अभ्यान्तर प्रयोग और साथ मे एरण्ड तैल मे गर्म किये हुए एरण्ड के पत्तों से सेक लाभदायक ।
  • आमवात रोग मे बहुत ही उपयोगी , इसके तैल मे भ्रष्ट हरितकी और सिंहनाद गुगलु बहुत ही उपयोगी ।
स्तनोंमे उत्पन्न गांठों मे एरण्डतैल लगाकर एरण्ड पत्र बांधने से लाभ मिलता है ।

मार्किट मे इसके निम्नलिखित योग आसनी से मिल सकते हैं---

एरण्ड पाक, एरण्डमूलादि क्वाथ, रास्नासप्तक क्वाथ, एरण्ड तैल, सिंहनाद गुग्गुलु आदि ।

Monday, June 7, 2010

Cichorium intybus,कासनी Endive


उत्तर भारत मे शीतकाल मे यह पौधा पैदा होता है । इसके पुष्प नीले रंग के आते है गर्मियो पुष्प और बीज आने के बाद यह सूख जाती है ।
प्रयोज्य अंग-- बीज, पत्र, मूल

मात्रा- पत्रस्वरस- १० से २० मि. लि. , बीज चुर्ण- ३- ५ ग्रा. मूल चुर्ण- ३-५ ग्रा.

उत्तम लिवर टोनिक, हृदय को बल देने वाली, कफ़पित्त शामक, मूत्रजनन, रक्तशोधक, आमाशय को बल देने वाली

युनानी चिकित्सा मे यह मह्त्वपूर्ण औषधि है ।
गुण- लघु, रुक्ष. रस-- तिक्त. विपाक- कटु, वीर्य- उष्ण

मुख्य प्रयोग--
नेत्रज्योति प्रकाशनि, शीतल, दाह, पित्त, ज्वर, कामला( पीलिया) , रक्तविकार , कृशता (शरीर का पतलापन) इन रोगो मे यह बहुत ही उपयोगी है ।
दिल की धड़कन के बड़ने पर इसके बीजो का शीत कषाय पीने से तुरंत लाभ मिलता है ]

मुख्य योग-- अर्क कासनी( हमदर्द)

Friday, May 14, 2010

Nerium indicum, Indian oleander करवीर,, कनेर


उत्तर भारत मे लगभग हर जगह बागों मे लगाया हुआ पाया जाता है । इसका हर भाग विषैला होता है अत: इसे किसी वैद्य की देखरेख मे ही प्रयोग करें ।

आधुनिक द्रव्यगुण मे इस को हृदय वर्ग मे रखा गया है ।

इसकी मुख्य दो प्रजातियां होती है श्वेत और रक्त यहाँ पर रक्त करवीर का वर्णन किया जा रहा है +

लघु, रुक्ष, तीक्ष्ण। कटु, तिक्त। उष्ण । उपविष

त्वचा रोग नाशक, व्रण शोधन, कुष्ठ रोग नाशक, कफ़वात शामक, शोथहर, रक्तशोधक, हृदय रोगनाशक (दुर्बलता जन्य)

  • विभिन्न त्वचा रोगों मे इसके पत्रों से सिद्ध तैल का प्रयोग किया जाता है , इससे सिद्ध तैल व्रण शोधन और व्रण रोपण भी होता है ।
  • हृदय रोगो मे जब कोई और उपाय नही होता है तो इसका प्रयोग किया जाता है , इसके मात्रा १२५ मि. ग्रा से ज्यादा नही होनी चाहिये
श्वास और कास रोग मे करवीर के पत्रों की भस्म को शहद मे मिलाकर देने से लाभ मिलता है

वैद्य की देखरेख मे ले ।

चित्रप्राप्ति स्थान== करनाल हरियाणा

मात्रा-- मूल चुर्ण-- १२५ मि. ग्रा

Friday, April 30, 2010

Adhatoda vasica , Malabar Nut, अडुसा, वासा, वाजीदन्त,सिंहास्य


यह एक बहुवर्षायु क्षुप होता है और भारत वर्ष मे लगभग हर जगह मिल जाता है , इसके पुष्प सफ़ेद रंग के और मण्जरियों मे आते है , स्वाद मे ये मीठे होते है ।

गुणकर्म-- रुक्ष, लघु रस-- तिक्त, कषाय विपाक-- कटु वीर्य-- उष्ण

कफ़पित्त शामक, रक्तरोधक, रक्तशोधक, रक्तार्श नाशक, कासहर, श्वास हर, शोथहर, वेदना स्थापन,

  • रीढ की हड्डी की चोट मे इसके पत्तों को एरण्ड तैल से गरम करके बांधने से लाभ मिलता है ।
  • पीले पके हुए पत्तों का पूटपाक विधि से निकाले हुए रस का प्रयोग विभिन्न प्रकार कास मे किया जाता है
  • रक्तप्रदर और रक्तज अर्श मे इसके स्वरस और देसी खांड मिलाकर खानी पेट देने से लाभ मिलता है ।
  • वासामूल चुर्ण और निम्ब पत्र चुर्ण से रक्तभार मे फ़ायदा मिलता है ।
  • फ़ुलों के मुरब्बे का प्रयोग श्वास और कास मे कियाजाता है ।
  • विभिन्न चमडी के विकारो मे इससे सिद्ध पंचतिक्त घृत का प्रयोग किया जाता है
  • फ़ेफ़ड़ों और हृदय के लिये यह अतीव उपयोगी है।

चित्र प्रप्ति स्थान-- करनाल (हरियाणा)
प्रचलित योग- वासावलेह, वासारिष्ट, पंचतिक्त घृत आदि]


Monday, April 19, 2010

Achyranthes aspera, अपामार्ग, लटजीरा,Prickly chaff flower


उत्तरभारत लगभग हर जगह मिल जाता है । बहुवर्षायु क्षुप, छोटे बीजों (कंटक युक्त) की मंजरी युक्त , इसके बीज यदि कपड़ों से स्पर्श हो जाते है तो चिपक जाते हैं ।


लघु, रुक्ष, तीक्ष्ण,

कटु, तिक्त

कटु विपाक एवं उष्ण वीर्य

उत्तम लीवर टोनिक, शोथहर, वेदना शामक, कृमिहर, शिरोविरेचन, हृदयरोग नाशक, रक्तज अर्श नाशक,

अपामार्ग के बीजो के नस्य लेने से छींके आती है और पुराना नजला और गर्दन के उपर के रोगों मे लाभ मिलता है

बीजों के कल्क को चावल के धावन से लेने पर रक्तज अर्श मे लाभ करता है
पांचांग का क्वाथ लिवर और उदर रोगों मे बहुत ही फ़ायदा करता है

इसका क्षार बेहतर कफ़ निस्सारक है , और विभिन्न कल्पनाओं मे प्रयोग किया जाता है , क्षारसुत्र मे भी इसका प्रयोग किया जाता है ।

कास श्वास मे इसका क्षार प्रयोग किया जाता है ।
धवल कुष्ठ निवारणार्थ इसके क्षार को मैनशिल और गोमुत्र मे पीसकर लेप कियाजाता है ।
इसकी मूल को गुलाब जल या शहद मे पीसकर आंखो मे लगाने से कृष्ण पटल के रोगों मे लाभ मिलता है


Sunday, April 18, 2010

Tinospora cordifolia, गिलोय बेल, अमृता, छिन्नरुहा


श्रीरामचन्द्र जी द्वारा रावण के संहार ऊपरांत जब सभी देवता अत्यंत प्रसन्न थे , तब इन्द्रदेव ने युद्ध मे मारे गये वानरो को पुनर्जीवत करने के लिये अमृत वर्षा की , जो बुन्दे वानरो पर पड़ी वो जीवीत हो गये , और जो बुन्दे धरती पर पड़ी उनसे ही इस पवित्र और अमृत रुपी बेल की उत्पति हुई । इसके गुण अमृत समान होने के कारण ही इसको अमृता भी कहा जाता है ।


त्रिदोषशामक , तिक्त, कटु, कषाय रस युक्त, मधुर विपाक वाली और उष्ण वीर्य वाली यह अमृता सारे उत्तर भारत मे लगभग सभी जगह मिल जाती है ।

यह रसायन, ओजोवर्धक, रक्तशोधक, शोधनाशक, ह्रुदयरोगनाशक, लीवर टोनिक, लगभग हर रोग मे काम आने वाली यह अमृता मेरी बहुत ही प्यारी है ।

प्रभाव से ही यह कमाला (पीलिया) का विनाश कर देती है , जीर्ण ज्वर को शीर्ण कर देती है । आमपाचन कर के यह अग्नि को तीव्र बना देती है, वातरक्त और आमवात के लिये तो यह महा काल है ।

वैद्य युक्ति पूर्वक इस अमृत कॊ लगभग सभी रोगों मे प्रयोग कर सकता है ।

प्रचलित योग-- अमृतारिष्ट, अमृतादि गुगुलु, कैशोरगुगुलु, गिलो सत्व, गिलो शरबत, गिलो चुर्ण, संमशनी वटी ,
अल्म्बुषादि चुर्ण ।

Saturday, April 3, 2010

Solanum surratence,Yellow Berried Night shade ,कंटकारी,छोटी कटेरी


इसका फ़ैलने वाला , बहुवर्षायु क्षुप होता है ,पत्ते लम्बे काँटो से युक्त हरे होते है , पुष्प नीले रंग के होते है , फ़ल क्च्चे हरित वर्ण के और पकने पर पीले रंग के हो जाते है , बीज छोटे और चिकने होते है ।

यह पश्चिमोत्तर भारत मे शुष्कप्राय स्थानों पर होती है ।

आयुर्वेदिक गुण कर्म--
गुण-- लघु, रुक्ष, तीक्ष्ण

रस-- तिक्त, कटु

विपाक-- कटु

वीर्य-- ऊष्ण

कफ़वात शामक, कासहर, शोथहर, रक्तशोधक, बीज शुक्रशोधन, हृदयरोगनाशक, वातशामक,रक्तभारशामक( Lowers the Blood pressure) ।

मै अपनी आयुर्वेदशाल मे इसको निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हूँ --
  • विभिन्न त्वचा रोगों मे पंचतिक्त घृत के रूप मे
  • विस्फ़ोट(Boils) पर इसके बीजों का लेप किया जाता है
  • श्वास व कास रोगों मे , जहाँ कफ़ गाड़ा और पीलापन लिये हुए होता है
कंटकारी के प्रचलित योग -- व्याघ्रीहरितकी, कण्टकारी घृत, व्याघ्री तैल, पंचतिक्तघृत, निदिग्धिकादि क्वाथ ।

Friday, April 2, 2010

Boerhavia diffusa,Spreading hogweed पुनर्नवा, गदहपुरना


यह एक फ़ैलने वाला क्षुप होता है जो कि स्मस्त भारत मे प्राय: शुष्क स्थानो मे होता है , गर्मियों मे यह सूख जाता है , इसके पत्ते लालिमा लिये हुए हरे रंग के मांसल, लटवाकार, होते है , काण्ड लालिमा लिये हुए हरे रंग का होता है । पुष्प बहुत छोटे और गुलाबी रंग के होते है और एक लम्बी टहनी (वृन्त) पर गुच्छों मे आते है , इसकी मूल का ज्यादा प्रयोग होता है ।

आयुर्वेदिक गुण कर्म--
गुण-- लघु, रुक्ष

रस-- मधुर, तिक्त, कषाय
विपाक-- मधुर

वीर्य-- ऊष्ण


त्रिदोषशामक,शोथघ्नी,विरेचक,नेत्रविकार नाशक, कब्ज नाशक, विषहर, पाण्डु रोग नाशक, उदर रोग नाशक, सर्वांगशोथ नाशक, मुत्रविरेचक,ह्रुदय रोग नाशक,

मै अपनी आयुर्वेदशाला मे इसको निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हूँ ---

१. सभी प्रकार की स्थानिक सुजन और सर्वांग सुजन मे इसकी मूल के कल्क को थोड़ा गरम करके शोथ युक्त स्थान पर लेप लगाने पर वह सुजन कम हो जाती है ।

२. सर्वांगशोथ विशेष कर हृदय जन्य शोथ मे यह बहुत ही लाभ करती है ।

३. अक्षि अभिष्यंद(eye flue) और अक्षि शूल मे इसकी मुल के स्वरस को डालने से चम्तकारी लाभ मिलता है ।

४. शोथ युक्त हृदय रोगों मे और यृकत(liver) जन्य शोथ मे इसकी मूल का क्वाथ या इसके शास्त्रीय योगों को देने से फ़ायदा मिलता है ।

५. इसके शाक का प्रयोग उदररोग, पाण्डु रोग(anemia),हृदय रोग , शोथ(edema), आमवात. आदि मे बेहिचक कर सकते हैं ।

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