Showing posts with label Liver Tonic. Show all posts
Showing posts with label Liver Tonic. Show all posts

Thursday, October 21, 2010

Phyllanthus niruri,भूमिआँवला


यह एक छोटा क्षुप होता है जो कि प्राय वर्षाऋतु मे अधिक मिलता है प्राय उत्तर भारत मे लगभग हर मिल जाता है ।
पत्ते हर रंग के डैंचे के पौधे के तरह होते है , यदि हम पत्तों को उलट कर देखते है तो छोटे छोटे आमले की तरह के बीज पत्ते के पीछे लगे रहते है इसीलिये इसे भुमि आमला के नाम से जाना जाता है ।
आधुनिक द्रव्यगुण मे इसको मुत्रल वर्ग मे रखा गया है लेकिन इसका मुख्य प्रयोग लीवर रोगों मे सफ़लता पूर्वक किया जा रहा है ।

यह रुक्ष, लघु, तिक्त, कषाय , मधुर , और वीर्य मे शीत स्वभाव का होता है
यह वातकृत और कफ़पित्तशमन होता है ।
विभिन्न प्रकार के दुष्ट व्रणो मे उपद्रवॊं को रोकने के लिये इसको धारण किया जाता है ।
लीवर के रोगो मे यह बहुत ही उपयोगी होता है ।
यह मुत्रविरेचक भी होता है ।
मैने इसका स्वतंत्र रुप से अपनी आयुर्वेदशाला मे प्रयोग नही किया है ।
चित्रप्राप्ति स्थान-- जिला करनाल हरियाणा
प्रयोज्यांग-- पांचाग, मात्रा-- स्वरस १० से २० मि. लि. चुर्ण- १ से ३ ग्रा. ।

Saturday, August 14, 2010

eclipta alba, भृंगराज

यह एक छोटा क्षुप होता है जो कि उत्तर भारत मे लगभग हर जगह मिल जाता है , यह प्राय: नमी वाली जगह पर मिलता है ।


पत्ते लंबे और नोकिले होते हैं व अभिअमुख होते हैं । तने का रंग लालिमा लिये हुए होता है , पूराने पौधे के पत्ते भी लालिमा लिये हुए हरे रंग के होते हैं ।
पुष्प छोटे वृण्त युक्त और सफ़ेद रंग के होते है । तथा छोटे छोटे बीजो युक्त होते हैं बिल्कुल सुरज मुखी के फ़ुलों की तरह लगते हैं ।
यह कटु रस युक्त तीक्ष्ण , रुक्ष, उष्ण होता है ,
प्रभाव -- केशों को रंजने वाला , यानि इसका प्रयोग मुख्य रूप से बालों की बिमारियों मे किया जाता है ।
कफ़वात शामक, उत्तम रसायन, लिवर टोनिक, केश्य, कृमिनाशक, श्वासकास नाशक, नेत्ररोग नाशक, शिरोरोग नाशक ।
मै इसको अपनी आयुर्वेदशाला मे निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हूँ --
  • उदररोगॊं मे इसके स्वरस का प्रयोग ।
  • अर्श या बवासीर मे इसके स्वरस का प्रयोग और इसके पांचाग की मसी का प्रयोग रक्तजार्श मे स्थानिक प्रयोग
  • विभिन्न रसायन कर्मो के लिये भृंगराजासव का प्रयोग
  • बालो की सम्स्याऒ मे इससे सिद्द तैल का प्रयोग
  • विभिन्न त्वचारोगों मे स्थानिक और अभ्यांतर प्रयोग
  • मुत्ररोगो मे जब मुत्र की मात्रा कम हो और मुत्र गाड़ा और लाल रंग का हो
चित्र प्राप्ति स्थान --- राणा एग्रिकल्चर फ़ार्म जिला करनाल हरियाणा ।
Posted by Picasa

Monday, June 7, 2010

Cichorium intybus,कासनी Endive


उत्तर भारत मे शीतकाल मे यह पौधा पैदा होता है । इसके पुष्प नीले रंग के आते है गर्मियो पुष्प और बीज आने के बाद यह सूख जाती है ।
प्रयोज्य अंग-- बीज, पत्र, मूल

मात्रा- पत्रस्वरस- १० से २० मि. लि. , बीज चुर्ण- ३- ५ ग्रा. मूल चुर्ण- ३-५ ग्रा.

उत्तम लिवर टोनिक, हृदय को बल देने वाली, कफ़पित्त शामक, मूत्रजनन, रक्तशोधक, आमाशय को बल देने वाली

युनानी चिकित्सा मे यह मह्त्वपूर्ण औषधि है ।
गुण- लघु, रुक्ष. रस-- तिक्त. विपाक- कटु, वीर्य- उष्ण

मुख्य प्रयोग--
नेत्रज्योति प्रकाशनि, शीतल, दाह, पित्त, ज्वर, कामला( पीलिया) , रक्तविकार , कृशता (शरीर का पतलापन) इन रोगो मे यह बहुत ही उपयोगी है ।
दिल की धड़कन के बड़ने पर इसके बीजो का शीत कषाय पीने से तुरंत लाभ मिलता है ]

मुख्य योग-- अर्क कासनी( हमदर्द)

Monday, April 19, 2010

Achyranthes aspera, अपामार्ग, लटजीरा,Prickly chaff flower


उत्तरभारत लगभग हर जगह मिल जाता है । बहुवर्षायु क्षुप, छोटे बीजों (कंटक युक्त) की मंजरी युक्त , इसके बीज यदि कपड़ों से स्पर्श हो जाते है तो चिपक जाते हैं ।


लघु, रुक्ष, तीक्ष्ण,

कटु, तिक्त

कटु विपाक एवं उष्ण वीर्य

उत्तम लीवर टोनिक, शोथहर, वेदना शामक, कृमिहर, शिरोविरेचन, हृदयरोग नाशक, रक्तज अर्श नाशक,

अपामार्ग के बीजो के नस्य लेने से छींके आती है और पुराना नजला और गर्दन के उपर के रोगों मे लाभ मिलता है

बीजों के कल्क को चावल के धावन से लेने पर रक्तज अर्श मे लाभ करता है
पांचांग का क्वाथ लिवर और उदर रोगों मे बहुत ही फ़ायदा करता है

इसका क्षार बेहतर कफ़ निस्सारक है , और विभिन्न कल्पनाओं मे प्रयोग किया जाता है , क्षारसुत्र मे भी इसका प्रयोग किया जाता है ।

कास श्वास मे इसका क्षार प्रयोग किया जाता है ।
धवल कुष्ठ निवारणार्थ इसके क्षार को मैनशिल और गोमुत्र मे पीसकर लेप कियाजाता है ।
इसकी मूल को गुलाब जल या शहद मे पीसकर आंखो मे लगाने से कृष्ण पटल के रोगों मे लाभ मिलता है


Sunday, April 18, 2010

Tinospora cordifolia, गिलोय बेल, अमृता, छिन्नरुहा


श्रीरामचन्द्र जी द्वारा रावण के संहार ऊपरांत जब सभी देवता अत्यंत प्रसन्न थे , तब इन्द्रदेव ने युद्ध मे मारे गये वानरो को पुनर्जीवत करने के लिये अमृत वर्षा की , जो बुन्दे वानरो पर पड़ी वो जीवीत हो गये , और जो बुन्दे धरती पर पड़ी उनसे ही इस पवित्र और अमृत रुपी बेल की उत्पति हुई । इसके गुण अमृत समान होने के कारण ही इसको अमृता भी कहा जाता है ।


त्रिदोषशामक , तिक्त, कटु, कषाय रस युक्त, मधुर विपाक वाली और उष्ण वीर्य वाली यह अमृता सारे उत्तर भारत मे लगभग सभी जगह मिल जाती है ।

यह रसायन, ओजोवर्धक, रक्तशोधक, शोधनाशक, ह्रुदयरोगनाशक, लीवर टोनिक, लगभग हर रोग मे काम आने वाली यह अमृता मेरी बहुत ही प्यारी है ।

प्रभाव से ही यह कमाला (पीलिया) का विनाश कर देती है , जीर्ण ज्वर को शीर्ण कर देती है । आमपाचन कर के यह अग्नि को तीव्र बना देती है, वातरक्त और आमवात के लिये तो यह महा काल है ।

वैद्य युक्ति पूर्वक इस अमृत कॊ लगभग सभी रोगों मे प्रयोग कर सकता है ।

प्रचलित योग-- अमृतारिष्ट, अमृतादि गुगुलु, कैशोरगुगुलु, गिलो सत्व, गिलो शरबत, गिलो चुर्ण, संमशनी वटी ,
अल्म्बुषादि चुर्ण ।

Friday, April 2, 2010

Boerhavia diffusa,Spreading hogweed पुनर्नवा, गदहपुरना


यह एक फ़ैलने वाला क्षुप होता है जो कि स्मस्त भारत मे प्राय: शुष्क स्थानो मे होता है , गर्मियों मे यह सूख जाता है , इसके पत्ते लालिमा लिये हुए हरे रंग के मांसल, लटवाकार, होते है , काण्ड लालिमा लिये हुए हरे रंग का होता है । पुष्प बहुत छोटे और गुलाबी रंग के होते है और एक लम्बी टहनी (वृन्त) पर गुच्छों मे आते है , इसकी मूल का ज्यादा प्रयोग होता है ।

आयुर्वेदिक गुण कर्म--
गुण-- लघु, रुक्ष

रस-- मधुर, तिक्त, कषाय
विपाक-- मधुर

वीर्य-- ऊष्ण


त्रिदोषशामक,शोथघ्नी,विरेचक,नेत्रविकार नाशक, कब्ज नाशक, विषहर, पाण्डु रोग नाशक, उदर रोग नाशक, सर्वांगशोथ नाशक, मुत्रविरेचक,ह्रुदय रोग नाशक,

मै अपनी आयुर्वेदशाला मे इसको निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हूँ ---

१. सभी प्रकार की स्थानिक सुजन और सर्वांग सुजन मे इसकी मूल के कल्क को थोड़ा गरम करके शोथ युक्त स्थान पर लेप लगाने पर वह सुजन कम हो जाती है ।

२. सर्वांगशोथ विशेष कर हृदय जन्य शोथ मे यह बहुत ही लाभ करती है ।

३. अक्षि अभिष्यंद(eye flue) और अक्षि शूल मे इसकी मुल के स्वरस को डालने से चम्तकारी लाभ मिलता है ।

४. शोथ युक्त हृदय रोगों मे और यृकत(liver) जन्य शोथ मे इसकी मूल का क्वाथ या इसके शास्त्रीय योगों को देने से फ़ायदा मिलता है ।

५. इसके शाक का प्रयोग उदररोग, पाण्डु रोग(anemia),हृदय रोग , शोथ(edema), आमवात. आदि मे बेहिचक कर सकते हैं ।

Saturday, March 27, 2010

Soleanum nigrum , मकोय, मको, काकमाची


काकमाची या मको उत्तर भारत मे लग्भग हर जगह पायाजाता है । यह पौधा खुब हरा भराहोताहै । दैनिक चिकित्सा मे मै इसको भरपुर उपयोग मे लाता हूँ । लिवर को रोगो मे इसका उपयोग बहुत ही उपयोगी है ! जहाँ एक से एक महंगी औषधियाँ काम नही करती यह काम कर जाती है । गुण तथा दोष कर्म--- तिक्त तथा कटुरस,स्निगध, उष्ण, रसायन, शुक्रजनन, तथा त्रिदोषशामक लिवर रोगो मे इसको देने का तरीका---शुद्ध भूमि से इसके पौधे को जड समेत उखाड कर अच्छी तरह से धो लें। इसके बाद इसको कुट कर इसका रस निकाल ले । एक मिट्टी कि हाण्डी लेकर इस रस को तब तक मन्द आँच पर तब तक गर्म करें जब तक की इसका रँग हल्का गुलाबी नही हो जाता । अब इसकॊ करीब ५० मि. लि. लेकर इसमे ३ काली मिर्चों का चुर्ण डालकर पी जाएं यदि आपकी जठराग्नि तीव्र है तो इसकॊ खाली पेट ले नही तो खाना खाने के १ घन्टे बाद ले । दिन केवल एक बार ले ध्यान देने योग्य बात यह है कि स्वरस हर रोज ताजा उपयोग करें। हर रोज बनाये और प्रयोग मे लाएं।

Trusted Ayurvedic Treatment Since 2004 – Safe, Herbal, and Effective for All!

Trusted Ayurvedic Treatment Since 2004 – Safe, Herbal, and Effective for All! Looking for a natural, safe, and effective solution for chroni...